यूरोप में अरब स्प्रिंग की आहट? सड़कों पर उबलता गुस्सा और दरकते सत्ता के किले
यूरोप में जिस तरीके से जनता का असंतोष फैल रहा है वो अब यूरोपिय लीडर्स को डराने लगा है. यही नहीं अब यूरोप की जनता ने तो विद्रोह का कैलेंडर तक जारी कर दिया है.
यूरोप, जो दुनिया को तरक्की, ताकत और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता है. आज उसी यूरोप की सड़कों पर गुस्सा उबल रहा है. फ्रांस से सर्बिया, इटली से स्पेन समेत यूरोप के कई देशों तक, महंगाई, बेरोजगारी और मकानों के आसमान छूते किराये से युवा परेशान हैं. सड़कों पर प्रदर्शन, पुलिस से टकराव और अब विरोध का कैलेंडर. ऐसे में सवाल है, क्या यूरोप में 2010 जैसी अरब स्प्रिंग की आहट सुनाई देने लगी है? क्या छोटी-छोटी चिंगारियां किसी बड़े सियासी तूफान में बदलने वाली हैं?
फ्रांस से जो प्रोटेस्ट और हिंसा शुरू हुई वो धीरे-धीरे यूरोप के और भी देशों में फैल चुका है. पेरिस में हिंसक प्रदर्शन, मिलान में हिंसा, जल रहा इटली, स्पेन में जनता का हल्ला बोल, अल्बानिया में जन विद्रोह, मतलब यूरोप का उबलता हुआ गुस्सा दिखाई दे रहा है.
भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद
कहीं सड़कों पर आग है, कहीं पुलिस की कार्रवाई, कहीं सरकार के खिलाफ नारे हैं और कहीं हाथों में बैनर लेकर निकले लोग अपने लिए छत मांग रहे हैं. यूरोप के अलग-अलग देशों में अलग-अलग वजहों से जनता सड़कों पर है. फ्रांस में महंगाई और शिक्षा व्यवस्था पर गुस्सा है, तो इटली में वेतन और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर नाराजगी, जबकि स्पेन में महंगे किराये के खिलाफ जनता सड़कों पर है. अल्बानिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही है.
जनता की जेब खाली
लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ अलग-अलग देशों का असंतोष है. या यूरोप के भीतर कोई बड़ा राजनीतिक तूफान आकार ले रहा है? क्योंकि इतिहास गवाह है, जब जनता की जेब खाली होने लगे, जब भविष्य धुंधला दिखने लगे और जब सत्ता के जवाब जनता के सवालों से छोटे पड़ने लगें तो सड़कों का मिजाज बदलने लगता है. और इसी बदलते मिजाज ने यूरोप को एक पुराने नाम की याद दिला दी है, ‘अरब स्प्रिंग.
अरब स्प्रिंग क्या है, इसका असर क्या हुआ?
साल 2010 के आखिर में ट्यूनीशिया से उठी चिंगारी, देखते ही देखते अरब दुनिया के कई देशों तक पहुंच गई थी. ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया और यमन में सत्ता परिवर्तन तक हो गया. दूसरे देशों में सत्ता के खिलाफ जनआक्रोश ने इतिहास की दिशा बदल दी और इसे नाम मिला अरब स्प्रिंग. उस वक्त भी महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, असमानता और राजनीतिक व्यवस्था से नाराजगी ने लोगों को सड़कों पर उतारा था. अब 2026 में यूरोप की तस्वीरें भी कुछ ऐसे ही सवाल उठा रही हैं.
तब जनता के विरोध ने सत्ताधीशों की नींव हिला दी थी और आज एकबार फिर यूरोप में भी सत्ताधीशों के किले नींव दरकने लगी है. फर्क सिर्फ इतना है कि अरब स्प्रिंग का केंद्र उन देशों की सत्तावादी व्यवस्थाएं थीं, जबकि यूरोप में आज के प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के भीतर अलग-अलग आर्थिक और राजनीतिक शिकायतों से पैदा हो रहे हैं.
आंदोलन ने सत्ताधीशों का सिंहासन हिलाया
यानी लोकतंत्र में भी अगर जनता को अपना भविष्य अंधकार में दिखने लगेे तो नाराजगी सिर्फ वोट तक सीमित नहीं रहती, सड़कों पर भी उतर आती है. आज से ठीक 16 साल पहले अरब स्प्रिंग की शुरूआत ट्यूनीशिया से हुई थी जो देखते ही देखते अरब के 8 देशों तक फैल गई. तब भी जनता सड़कों पर महंगाई, बेरोजगारी, सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरी थी और इस आंदोलन ने सत्ताधीशों का सिंहासन हिला दिया था. अब कुछ ऐसी ही तस्वीर यूरोप में भी देखने को मिल रही है. यहां भी कई देश की जनता गुस्से से खौल रही है.
यूरोप में भीषण विरोध प्रदर्शन हो रहा है, जो अब अरब स्प्रिंग का रूप ले रहा है. जिस तरीके से अरब के देशों में सत्ता के खिलाफ साल 2010 से विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था, जिसमें कई जगह सत्ता परिवर्तन हो गया था. क्या अब यूरोप में भी अरब स्प्रिंग जैसे हालात होने वाले हैं?
जिस तरह से अरब स्प्रिंग आंदोलन ट्यूनीशिया से शुरू हुआ था, अब यूरोप में इस बगावत का केंद्र बना है फ्रांस. जहां सड़कों पर लाखों की तादाद में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं. पेरिस की सड़कों पर युवा बेकाबू हो चुके हैं, हर तरफ अफरा तफरी का माहौल है. कहीं आगजनी हो रही है, तो कहीं नकाबपोश प्रदर्शनकारी दुकानों में लूटपाट कर रहे हैं.
राष्ट्रपति इमैनुएल मैंक्रों के इस्तीफे की मांग
फ्रांस में हो रहे प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन के बढ़ते खर्च, बदतर शिक्षा व्यवस्था, सरकारी नीतियों के खिलाफ गुस्सा और कहीं जगह राष्ट्रपति इमैनुएल मैंक्रों के इस्तीफे की मांग भी है. आज 16 साल बाद फ्रांस भी उसी दौर में पहुंच गया है. जहां ट्यूनिशिया आज से 16 साल पहले खड़ा था. वहां भी सड़कों पर सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ जन आक्रोश की झलक थी और आज फ्रांस में भी वहीं झलक देखने को मिल रही है. यानी दशक भले ही अलग हैं, देश भले ही अलग हैं लेकिन मकसद एक ही है.
सिर्फ फ्रांस ही नहीं बल्कि इटली की सड़कों पर भी जनता का गुस्सा है. सरकार के खिलाफ नारेबाजी है. अपने हक के लिए लोग सड़कों पर आवाज बुलंद करते नजर आ रहे हैं. छात्रों और युवाओं का एक छोटा आंदोलन, राष्ट्रव्यापी आंदोलन में तब्दील हो गया है. अगले कुछ घंटों में यूरोप के कई देशों में बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारी है. बकायदा इसका कैलेंडर भी जारी हो गया है.
महंगाई, ईंधन की कीमतें और बढ़ते खर्च को लेकर प्रदर्शन
फ्रांस में आज (24 अक्टूबर) येलो वेस्ट प्रदर्शन किया जाएगा, जिसमें महंगाई, ईंधन की कीमतें और बढ़ते खर्च को लेकर प्रदर्शन किया जाएगा. देशभर में अलग अलग इलाकों में प्रदर्शन होंगे. वहीं इटली में भी 24 अक्टूबर को सरकार-विरोधी प्रदर्शन का ऐलान किया गया है, जिसमें आर्थिक दबाव और सामाजिक असंतोष को लेकर लोग सड़कों पर उतरेंगे. वहीं बेल्जियम के बेसेल्स में भी बढ़ती महंगाई, बढ़ते खर्च, और सरकारी बजट में की गई कटौतियों को लेकर प्रदर्शन का ऐलान किया गया है.
यूरोप में हो रहे जनआंदोलन ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अरब स्प्रिंग की तरह यूरोप में भी यूरोप स्प्रिंग की आहट सुनाई देने लगी है. भले ही अभी हालात पूरी तरह से इस ओर इशारा नहीं कर रहे. लेकिन हालात बदलते देर नहीं लगती और यूरोप में हर बीतते पल के साथ हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं.
विद्रोह का कैलेंडर जारी
यूरोप में जिस तरीके से जनता का असंतोष फैल रहा है वो अब यूरोपिय लीडर्स को डराने लगा है. यही नहीं अब यूरोप की जनता ने तो विद्रोह का कैलेंडर तक जारी कर दिया है. 24 अक्टूबर को फ्रांस, इटली और बेल्जियम में प्रदर्शन का ऐलान किया गया है. 30 अक्टूबर को पूरे इटली में राष्ट्रव्यापी हड़ताल की घोषणा की गई है.
31 अक्टूबर को फ्रांस और जर्मनी में जनता ने सड़कों पर उतरने का ऐलान किया है. 5 नवंबर को फ्रांस में एकबार फिर देशभर में हड़ताल और प्रदर्शन की घोषणा की गई है. 11 नवंबर को स्पेन में आवास संकट और महंगे किराये को लेकर छात्रों ने प्रदर्शन की कॉल दी है. तो वहीं 20 नवंबर को इटली में चक्का जाम हड़ताल का ऐलान किया गया है. यानी पूरे यूरोप पर अब जन विरोध का वो साया घिरने लगा है. जिसने सत्ता की बेचैनी बढ़ा दी है.
रिपोर्ट: करुणाशंकर शर्मा



